Saturday, September 19, 2020
Saturday, August 22, 2020
Tuesday, August 18, 2020
क्या कहूं ?
पहले मेरे दिल को कुछ काम था,
तेरा इंतज़ार जो उसको सुबह शाम था।
तू आये..... तू आये......
सोच सोच कर परेशां था।
आज तेरे एक शब्द ने तार तार कर डाले उस दिल के तार,
जो हर पल माला जपने में मस्त था,
जब जाना, तेरे पास तो तेरा दिल था ही नहीं,
वो खुद किसी और की माला जपने में व्यस्त था।
आस
घर के कोने आज उदास से हैं,
बाग़ का फूल जो गिर गया है…
उसकी जगह तो शायद कोई दूसरा फूल ले लेगा,
पर, तेरा हाल उससे भी बदतर है।
शायद…..
आज भी उस बाग़ को तेरी एक नज़र की आस है,
लेकिन ….
दिल तेरा किसी और के पास है।
30.11.1994
मोह
तुझसे भली तो खुशबु है फूलों की,
उसका काल तो ज्ञात होता है,
दो दिन में फूल मुरझा कर झड़ जाता है
मोह- भंग संग उसके शीघ्र हो जाता है,
शायद,
तुझ से मोह..... मेरा संग छोड़ने वाला है।
30.11.1994
"चले जाओगे"
तुम आओगे,
मालूम
है
मुझे
.....
हाथ
प्यार
का
दिल
पर
रखकर …
दो
बोल
प्यार
के
बोलकर….
पल
पल
घड़ी
में
पल
देखकर….
मेरे
व्याकुल
हृदय
को
तोड़कर ….
पुन:
चले
जाओगे
मुझे
छोड़कर।
- करिश्मा पाल
30.11.1994
शायद! तुम आने वाले हो।
शायद
खुशबू अच्छी है…… पास आ रही है,
तन्हाई भी अच्छी है..... दूर जा रही है।
प्रेम की छाया भी प्रकाश को चीरती,
डरती- सहमती ही सही, आज पास आ रही है,
शायद! तुम आने वाले हो।
- करिश्मा पाल
30.11.1994
Friday, July 3, 2020
डर सा लगता है!
Wednesday, June 24, 2020
"मन क्षितिज हो चला है"
दूर तलक तकती आँखें,
एक साया सा टटोल रही हैं।
कुछ तो है, जो , खींच रहा है!
अपने अस्तित्व को उभारता सा,
कभी लगता है "करिश्मा"
मन क्षितिज सा हो चला है।
कुछ होने का अहसास सा है, एक आभास सा है,
मानो एक राह बुला सी रही फिर जीने के लिए,
हर मोड़ पर किसी की आहट सी है,
मृग सी हर पल आँखें मेरी,
दौड़ सी लगा रहीं है मरीचिका की तलाश में,
मन में सवाल हज़ारों हैं, क्या करूँ मैं,
मन क्षितिज सा हो चला है।
आँखें मरीचिका को तलाशती हैं,
दिल कहता है किस पर अब ऐतबार कर लूँ,
मस्तिष्क किसी की आहट से झंकृत है,
किसी नयी सुबह की शुरुआत के लिए,
एक अनजान सा साया थकी आँखों को थामता सा,
अनजान बेबसी सी है, क्या करूँ मैं,
मन क्षितिज सा हो चला है।
-करिश्मा पाल
Monday, June 22, 2020
काश
काश मैं पंछी होती,
फुर्र से विचलती मचलती स्वच्छंद नभ में,
तिनका- तिनका जोड़, नीड़ बनाती,
स्वतंत्रता से पंख फैलाये इठलाती घूमती।
काश मैं तितली होती,
फूलों का रंग मेरा अपना होता,
गुलाब- चमेली मेरी सहेली होतीं,
पराग फूलों का ले झोली भर्ती,
एक फूल से दूजे पर मद मस्त उड़ती रहती।
काश मैं चील होती,
आकाश की ऊंचाई से दुश्मन दबोचने में सक्षम होती,
असलियत सबकी सामने होती, तो
किसी से कोई इक्षा-तमन्ना भी न होती।
काश कि मैं मैं न होती,
वो होती जो मैं नहीं हूँ,
फिर जैसी भी मैं होती,
संभवत: या निश्चितत:
आज से तो मैं बेहतर ही होती.
- करिश्मा पाल
06.09.1996