Tuesday, August 18, 2020

क्या कहूं ?

पहले मेरे दिल को कुछ काम था,

तेरा इंतज़ार जो उसको सुबह शाम था। 

तू आये.....  तू आये...... 

सोच सोच कर परेशां था। 

आज तेरे एक शब्द ने तार तार कर डाले उस दिल के तार,

जो हर पल माला जपने में मस्त था,

जब जाना, तेरे पास तो तेरा दिल था ही नहीं

वो खुद किसी और की माला जपने में व्यस्त था।  


- करिश्मा पाल 

आस

घर के कोने आज उदास से हैं,

बाग़ का फूल जो गिर गया है

 

उसकी जगह तो शायद कोई दूसरा फूल ले लेगा,

पर, तेरा हाल उससे भी बदतर है। 

 

शायद…..

आज भी उस बाग़ को तेरी एक नज़र की आस है,

 

लेकिन ….

दिल तेरा किसी और के पास है।  

 

- करिश्मा पाल 

30.11.1994 

मोह

तुझसे भली तो खुशबु है फूलों की,

उसका काल तो ज्ञात होता है,

दो दिन में फूल मुरझा कर झड़ जाता है 

मोह- भंग संग उसके शीघ्र हो जाता है,

शायद

तुझ से मोह..... मेरा संग छोड़ने वाला है।   


 - करिश्मा पाल 

30.11.1994 

 


"चले जाओगे"

तुम आओगे,

मालूम है मुझे ..... 

 

हाथ प्यार का दिल पर रखकर …

दो बोल प्यार के बोलकर….

 

पल पल घड़ी  में पल देखकर….

मेरे व्याकुल हृदय को तोड़कर ….

 

पुन: चले जाओगे मुझे छोड़कर।


  - करिश्मा पाल 

30.11.1994 

शायद! तुम आने वाले हो।

शायद 

 

खुशबू अच्छी है…… पास रही है,

तन्हाई भी अच्छी है..... दूर जा रही है। 

 

प्रेम की छाया भी प्रकाश को चीरती,

डरती- सहमती ही सही, आज पास रही है,

 

शायद! तुम आने वाले हो। 


- करिश्मा पाल 

30.11.1994 

 

Friday, July 3, 2020

डर सा लगता है!

डर सा लगता है 

वास्तविकताओं से अब, डर सा लगता है,
अपनों की महफ़िल में, हर चेहरा,अजनबी सा लगता है। 

लगता है, मानो, पृथ्वी का भार  आ गया है सीने पर,
भावनाएं गले में जैसे अटक सी गयीं हैं,
हर चेहरे का दुःख, अपना सा लगता है,
वास्तविकताओं से अब, डर सा लगता है। 

जब हवा चलती है, तो मानो 
जान छुड़ा कर भाग रही हो शत्रु के शिकंजे से,

पत्ती जब खड़गती है, तो मानो 
खुद को उसने बेमन जोड़ा हुआ है पौधे से,

ज़रूरी तो नहीं, हवा का वेग, उसकी प्रवृत्ति है,
ज़रूरी तो नहीं, पत्ती का पौधे से जुड़े रहना उसकी नियति है,

आसमां के तारों का टिमटिमाना उसका रुदन लगता है,
वास्तविकताओं से अब, डर सा लगता है। 



 

Wednesday, June 24, 2020

"मन क्षितिज हो चला है"

"मन क्षितिज हो चला है"

दूर तलक तकती आँखें,
एक साया सा टटोल रही हैं।
कुछ तो है, जो , खींच रहा है!
अपने अस्तित्व को उभारता सा,
कभी लगता है "करिश्मा"
मन क्षितिज सा हो चला है।

कुछ होने का अहसास सा है, एक आभास सा है,
मानो एक राह बुला सी रही फिर जीने के लिए,
हर मोड़ पर किसी की आहट सी है,
मृग सी हर पल आँखें मेरी,
दौड़ सी लगा रहीं है मरीचिका की तलाश में,
मन में सवाल हज़ारों हैं, क्या करूँ मैं,
मन क्षितिज सा हो चला है।

आँखें मरीचिका को तलाशती हैं,
दिल कहता है किस पर अब ऐतबार कर लूँ,
मस्तिष्क किसी की आहट  से झंकृत है,
किसी नयी सुबह की शुरुआत के लिए,
एक अनजान सा साया थकी आँखों को थामता सा,
अनजान बेबसी सी है, क्या करूँ मैं,
मन क्षितिज सा हो चला है।

-करिश्मा पाल




Monday, June 22, 2020

काश

                    काश 
काश मैं पंछी होती,
फुर्र से विचलती मचलती स्वच्छंद नभ में,
तिनका- तिनका जोड़, नीड़ बनाती, 
स्वतंत्रता से पंख फैलाये इठलाती घूमती। 

काश मैं तितली होती,
फूलों का रंग मेरा अपना होता,
गुलाब- चमेली मेरी सहेली होतीं, 
पराग फूलों का ले झोली भर्ती,
एक फूल से दूजे पर मद मस्त उड़ती रहती। 

काश मैं चील होती,
आकाश की ऊंचाई से दुश्मन दबोचने में सक्षम होती,
असलियत सबकी सामने होती, तो 
किसी से कोई इक्षा-तमन्ना भी न होती। 

काश कि मैं मैं न होती,
वो होती जो मैं नहीं हूँ, 
फिर जैसी भी मैं होती,
संभवत: या निश्चितत:
आज से तो मैं बेहतर ही होती. 

- करिश्मा पाल 
06.09.1996 





Monday, May 25, 2020

असम्भव सा वक्त

Lockdown 4.0 - मनोभाव

 ज़िंदगी वाकई घोड़े की तरह भाग रही थी बेतहाशा, रोज़ एक नया अड़ंगा पार करने की ललक....तेज़ और तेज़....बस कोई और आगे न निकल जाए...जैसे.... अचानक लगाम लग गयी मानो। शुरू में तो लगा, वाकई इस लगाम की ज़रूरत हो चुकी थी, दिलोदिमाग के साथ शरीर को भी, लेकिन अब वही रेस याद सी आने लगी है। कब तक कटे पंख लिए घोंसलों में कैद रहेगी ज़िंदगी, इस एहसास के साथ कि बाहर एक शिकारी है जो पंखों के साथ सब खत्म कर सकता है।

Monday, April 6, 2020

दारुण सत्य

दीया जलाती मैं
शिक्षित गंवार सी,
 पर्व मनाने को बेताब सी।

सहसा, 

तस्वीर उभरी लौ में,
उस बेबस पीड़ित की,
महामारी की घुटन में
सांसों के लिए मोहताज इंसान की।

तस्वीर उभरी उस की,
आँखे दारुण कथा बाँझती जिसकी।

मैं भी तो ज़ोरो से घंटे बजा रही थी
याद आयी मुझे अपनी ही ताली

दर्द उभर सा गया,
भूख से आकुल पेट ताक रहा था 
जब अपनी खाली थाली।

बेबस, 'करिश्मा' पिंजरे में कैद
ज़िंदगी बचाने को आतुर
दो पल खुशियों के अपनों के साथ बिताकर।

(:अर्थ:गंवार, यहाँ उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त जो शिक्षित होकर भी अनजान बना हुआ है)

- करिश्मा पाल