Friday, July 2, 2010

Nirakar

"निराकार "

क्यों किये हे मानव

निर्मित यह धर्मस्थल?

क्यों प्रभात बेला में,

खोजता फिरता है इश्वर?

क्यों शंख बजा मंदिर में

टेर लगाता है उसकी ?

क्यों आवाज़ लगाता मस्जिद में

तोड़ता शान्ति इस मन की ?

सूर्य की सुनहरी किरणों में

चाँद की रुपहली चांदनी में

क्यों ढूंढता फिरता है

उस निराकार अदृश्य को?

जानकर भी सारी बातें

क्यों भागता है जीवनभर

पकड़ने को परछाई?

जब वर्तमान हाथ से फिसल जाता है

तब हाथ मलता, पछताता है?

टेर लगाता मस्जिद में

मंदिर के घंटों से

कान फोड़ता है उसके जो

नहीं कहीं बाहर

तेरे हाथ में है

तेरे कर्म, तेरी आस्था ,

तेरी आत्मा में है,

हे अज्ञानी मनुष्य !

गंवाता है अपना बल, अपनी सामर्थ्य

खोजने में उस निराकार को ,

जो है नहीं कहीं ,

बस है तेरे मन में ,

तेरे विश्वास में,

तेरे भीतर, अंतरस्थल में ।

(करिश्मा पाल )