Wednesday, May 26, 2010

"आज सोने की कवायद खुद के साथ नाइंसाफी होगी, पर क्या करे 'करिश्मा' रोज़ाना वक़्त को रोका नही जाता,हाँ साथ अपने रात भी जागेगी यही वजह काफी है ख़ुशी के लिए"
खिड़की के किवाड़ खटखट करते रहे, और मैं एकटक चाँद को निहारकर उसकी चांदनी की गहराई नापती रही, होश तब आया जब तेज़ हवा ने आँचल भिगो डाला,'करिश्मा 'तब आंसुओं से बूंदों को अलग कर न सकी