Lockdown 4.0 - मनोभाव
ज़िंदगी वाकई घोड़े की तरह भाग रही थी बेतहाशा, रोज़ एक नया अड़ंगा पार करने की ललक....तेज़ और तेज़....बस कोई और आगे न निकल जाए...जैसे.... अचानक लगाम लग गयी मानो। शुरू में तो लगा, वाकई इस लगाम की ज़रूरत हो चुकी थी, दिलोदिमाग के साथ शरीर को भी, लेकिन अब वही रेस याद सी आने लगी है। कब तक कटे पंख लिए घोंसलों में कैद रहेगी ज़िंदगी, इस एहसास के साथ कि बाहर एक शिकारी है जो पंखों के साथ सब खत्म कर सकता है।
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