Friday, July 2, 2010

Nirakar

"निराकार "

क्यों किये हे मानव

निर्मित यह धर्मस्थल?

क्यों प्रभात बेला में,

खोजता फिरता है इश्वर?

क्यों शंख बजा मंदिर में

टेर लगाता है उसकी ?

क्यों आवाज़ लगाता मस्जिद में

तोड़ता शान्ति इस मन की ?

सूर्य की सुनहरी किरणों में

चाँद की रुपहली चांदनी में

क्यों ढूंढता फिरता है

उस निराकार अदृश्य को?

जानकर भी सारी बातें

क्यों भागता है जीवनभर

पकड़ने को परछाई?

जब वर्तमान हाथ से फिसल जाता है

तब हाथ मलता, पछताता है?

टेर लगाता मस्जिद में

मंदिर के घंटों से

कान फोड़ता है उसके जो

नहीं कहीं बाहर

तेरे हाथ में है

तेरे कर्म, तेरी आस्था ,

तेरी आत्मा में है,

हे अज्ञानी मनुष्य !

गंवाता है अपना बल, अपनी सामर्थ्य

खोजने में उस निराकार को ,

जो है नहीं कहीं ,

बस है तेरे मन में ,

तेरे विश्वास में,

तेरे भीतर, अंतरस्थल में ।

(करिश्मा पाल )

Monday, June 28, 2010

"शरणार्थी हूँ"

आज मैं शरणार्थी हूँ ,

देश अपना छोड़,

आत्मा भीतर से तोड़ ,

आज मैं शरणार्थी हूँ

माँ ने बताया था,

पृथ्वी पर हम भार हैं ,

ईश ने ऐसा क्यों रचा की

आज मैं शरणार्थी हूँ ,

नहीं ज्ञात क्या अधिकार हैं ,

क्या कर्तव्य हैं, मैं बेज़ार हूँ ,

आज मैं शरणार्थी हूँ।

कौन सा देश मेरा है ?

जहां पैदा हुआ था या

जिसने सहारा दिया?

प्रश्न आज उठा क्यूंकि

आज मैं शरणार्थी हूँ।

विडम्बना तो देख "करिश्मा"

जहां पैदा हुआ,उसने निष्कासित किया,

जहां सहारा मिला ,उसने प्रताड़ित किया ,

आत्मा से भी परे हूँ, क्यूंकि

आज मैं शरणार्थी हूँ।

मेरा मासूम बालक

इस देश का होगा या उस देश का

प्रश्नचिन्ह के साथ जीवन है,

आज मैं शरणार्थी हूँ ।

देवकी ने मानो जनम दिया

यशोदा ने जैसे पाला है

पर मैं कृष्ण तो नहीं

आज मैं शरणार्थी हूँ।

(करिश्मा)

समय के संग चेहरे बदले, इंसान बदल गया,

जो रहता था झोंपड़ी में, वो मकान बदल गया,

सराय की जगह ली पंचसितारा होटलों ने,

ढाबों जैसे भोजन का स्थान बदल गया ।

पूरी- कचोरी त्योहारों का आभास करवाते थे ,

आज पिज्जा-चाऊमिन से स्वाद बदल गया ।

स्त्री जो परदे के पीछे से बातें सुनती थी,

वकील-डोक्टर बन कर सारा हिसाब बदल गया।

संयुक्त परिवार की वंश परंपरा जो थी विद्यमान,

एकल परिवार अवधारणा से व्यवहार बदल गया।

सोचती हूँ 'करिश्मा,'

अगर नहीं बदला है तो वो है हमारा विधान,

मनुस्मृति,मिताक्षरा, कौटिल्य के अर्थशास्त्र ने समाज जकड रखा है ,

पुरातन व्यवस्था नहीं है किन्तु

कानून विवाह का है वैसा ही ।

आज जब परिवर्तन के दौर में जन की पहचान होनी चाहिए मन से,

पर रंग-जात -भाषा प्राथमिकता बनी की बनी हैं।

भौतिक रंगों से सामाजिक सियार रंगा हुआ है,

पंचतंत्र के सियार की याद दिलाता हुआ सिंह बनने की कोशिश में लगा हुआ है ।

आज, जब मकान बदल सकते हैं ,

जीवन के मापदंड बदल सकते हैं , तो ,

क्यों पुरातन व्यवस्था को बदला नहीं जा सका है?

आज की ज़रूरत है की

मनुस्मृति को बदलना होगा,

मिताक्षरा के विधान को फैंक नए विधान का सृजन करना होगा ,

ईसा पूर्व की कृति अर्थशास्त्र को केवल शोकेस में सजाना होगा ,

जो भूत है वो क्यूँ है आज पर हावी?

क्यों बलशाली हो पुरातन विधान,

क्यों अंग्रेजों का विधान हो बलवान?

जब समय परिवर्तन का परिचायक है, तो

क्यों उस विधि को नहीं बदल सकते जो समाज की ज़रूरतों के लिए बनती है?

विधि व्यक्ति का अधिकार है,उसके कर्तव्यों को बताता है

तो क्यों न हम सब मिलकर नए विधान की स्थापना करें ,

इक्कीसवीं शताब्दी के युग में एक नयी सोच, एक नयी मानसिकता का सृजन करें?

Wednesday, May 26, 2010

"आज सोने की कवायद खुद के साथ नाइंसाफी होगी, पर क्या करे 'करिश्मा' रोज़ाना वक़्त को रोका नही जाता,हाँ साथ अपने रात भी जागेगी यही वजह काफी है ख़ुशी के लिए"
खिड़की के किवाड़ खटखट करते रहे, और मैं एकटक चाँद को निहारकर उसकी चांदनी की गहराई नापती रही, होश तब आया जब तेज़ हवा ने आँचल भिगो डाला,'करिश्मा 'तब आंसुओं से बूंदों को अलग कर न सकी

Wednesday, April 14, 2010

आज का पावनदिन उन सभी के लिए महत्वपूर्ण है जो की मानवता के लिए अपनी जिंदगी का छोटा ही सही कुछ वक़्त देते हैं या सोचतें हैं। भारतरत्न भीम राव अम्बेडकरने ऐसी मिसाल युगों के लिए छोड़ दी है जिसके परिपालन से भेदभाव, अपमान और इंसान से नफरत करने की फितरत स्वमेव ही मीलों दूर चली जायेगी, रह जाएगा एक ऐसा समाज जो जनम के आधार पर नहीं वरन कर्म के आधार पर चलना सीख जायेगा। हमारा फ़र्ज़ बनता है की अधिकाधिक लोगों को भाईचारे का सन्देश समझाएं और इंसानियत के मार्ग पर अपने निशान छोड़तें चलें जाएँ।