Tuesday, November 22, 2011

"आज सोचा दिल में तेरे नाम को रात के अँधेरे में गुम करके नया सवेरा देखूंगी,
यह सोच कर रात भर करवटों में काट दी...
सुबह के उजाले ने जब दस्तक दी,
तब जाना की रात भर तेरे नाम की स्याही चादर पर बिखरती रही,
सुबह तेरे नाम से सराबोर चादर मुझे ,अंगूठा दिखा हंसती रही...
तेरा नाम मेरे दिल से निकल कर
चादर से जो लिपट गया था."

Saturday, April 9, 2011

"भ्रष्टाचार .....अन्ना का आह्वान....हमारा भविष्य" कलियुग के समय में उत्पन्न पृथ्वी पर पापों के ढेर में एक भ्रष्टाचार हुआ.मन में विचार किया कि इस भ्रष्टाचार की उत्पत्ति कहाँ से हुई? मन कुलबुलाया, सकुचाया, थोडा शरमाया..फिर बोला ;थोडा दिमाग को भी व्यायाम करने दो, सारे पाप मुझ से ही क्यों करवाते हो? दिमाग कि तरफ रुख किया, पर दिमाग तो बड़ा तेज निकला, अपनी तरफ रुख देख अपनी आँखें बंद करने का नाटक करने लगा। काफी मनाया तब जा कर एक हिंट दी जिसे समझने मैं बेवकूफ देर लगाती रही...झल्लाकर दिमाग चिल्लाया: सुबह बिजली का बिल भरने के लिए लाइन में लगी थी? मैंने शान से कहा: "लाइन में लगने कि बात करते हो, हम आज तक लाइन में नहीं लगे जनाब, और बिजली विभाग के तो सारे लोग अपनी पहचान के हैं, वहां तो सवाल ही नहीं उठता"। कहने के बाद मैं स्वयं चौंक पड़ी...दिमाग ने पलट के कहा ,"क्यों बत्ती जल गयी"...बड़ी बातें करती हो भ्रष्टाचार को समाप्त करने कीजब खुद पर आती है तो सुरमा बन जाती हो। दिमाग की बात सुन शरीर हिलने लगा, फिर दिमाग की तरफ हैरत से देखा और पूछा, भैया यह तो बताओ, यह लोकपाल बिल का क्या हल्ला है? दिमाग ने कहा," क्यों, क्या घास चरने की तय्यारी है,आज़ादी अंग्रेजों से पाकर अपने ही चुने लोगों की गुलाम बन गयी...खुद पावर्टी लाइन के निचे रह के चुने लोगों के स्विस खातों में करोड़ों भरवाती रही, चैन नहीं मिला क्या, जो अब अपने ही हाथों लोकतंत्र का गला घोंट कर तानाशाही की नींव रखने के लिए पागल हुई जा रही? सर खुजाते हुए पूछा," भैया, मैं कुछ समझ नहीं पाई", तब दिमाग ने बड़े एहसान दिखाकर समझाते हुए कहा," वैसे तो हम अपना ज्ञान अधिक बांटते नहीं, लेकिन तुम जोर दे रही हो तो बताये देते हैं, तो सुन, ..लोकपाल बिल बनाए जाने से एक ही व्यक्ति में विधायी , कार्यकारी, प्रशासनिक, न्यायिक ,सैनिक शक्तियों को प्रदान किया जायेगा, जिसके ऊपर किसी का अंकुश न होने की स्थिति में एक ऐसा पल आने का खतरा जब वेह शक्तिमान व्यक्ति सार्वभौमिक सत्ता प्राप्त करने के पश्चात निरंकुशता को प्रश्रय देने लगे "। मैंने दिमाग की और टकटकी लगा कर देखा और पूछा," अब क्या करना चाहिए?" दिमाग ने अति विद्वता से कहा," अन्नाजी की टीम में शामिल लोग उन सभी तबकों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैंजिनके हितों की वेह बात करते हैं, अत: हमारा दायित्व बनता है की हम अपने दोस्तों को आगाह करें की अपने अधिकारों की जंग में यदि अब पिछड़े तो .......अँगरेज़ तो विदेशी थे चले गए...अपने ही भाईओं को निरंकुशता के तख़्त से कैसे उतार पाओगे॥???" कहकर दिमाग ध्यान मग्न हो गया और मैं जैसे नींद से जाग गयी। (करिश्मा पाल)

Tuesday, April 5, 2011

आज यूँ ही जब ज़िन्दगी की बही को टटोला,एक एक पन्ना धुल में सना मिला,

जिंदगी की ऊँचाइयों और निचाईयों के चक्र में उलझ कर इसकी जांच ही नहीं की कभी,

एक पन्ने पर रिश्तों की गणना में एक एक कर सभी गलतियाँ ही मिली,

रह गयी एक अकेली मैं फिर उसी मुकाम पर

जहां से जनम लिया था ,एक छोटे से कमरे में..मैं॥

Monday, February 21, 2011


“आज बरस जाओ”
नभ पर बादल झूम- झूम जाते हैं,
काली घटाएं हवाओं के संग मचल-मचल जाती हैं,
मौसम अपनी जवान उमंगों से प्रफुल्लित हुआ जाता है,
पर, बिरहन के सूखे आंसूं देख- देख कर, हाहाकार कर,
हे बादल, तुम क्यूँ लौट जाते हो ?!?
तुम्हारी रवानी , तुम्हारी शोखी,
एक अदना सी बिरहन के दुःख से विचलित हो,
तुम बरसना क्यूँ भूल जाते हो?
जीवन का खेल ही अद्भुत है,
कोई तो बादलों कि गर्जनाओं को भूल कर,
बारिश के पानी में भीग-भीग कर
उफनती नदी को भी अदना समझ पार कर, प्रिय-मिलन को बैचैन है,
तो कोई, चाह के भी , नजदीकी के बावजूद मिलन से कोसों दूर है।
आज कोई सोहनी फिर से नहीं जनमती,
फिर कोई महिवाल सोहनी के लिए नहीं तड़पता,
तो हे बादल, तुम क्यों उस बिरहन का गुमसुम चेहरा देख विचलित हो लौट जाते हो?
आज का काल ही कुछ ऐसा बन चुका है,
सच्चे प्रेमी बिरहा ही सहते रह जाते हैं,
न तो कोई किसी के लिए जीता है,न ही मरता है,
न ही जान पर खेल कर कोई पृथ्वीराज आज संयोगिता को संगिनी बनाता है।
प्रेम के मायने मात्र एक लालच, एक तृष्णा बन चुके हैं,
सच्चाई सबसे दूर, कुछ ही के निकट है,
तो वो 'कुछ ही आँखों से आंसूं सुखा लेते हैंपर हे बादल, तुम क्यों नियति भुला शोखी भुला आते हो ?तुम तो जन्मे ही हो सुख देने के लिए
तुम पर संभवत: अब तक नव काल कि छाया नहीं नहीं, क्योंकि,
विचलन- तड़पन संसार से उठ गयी है,
कोई भी दुसरे के लिए तड़पना नहीं जानता,
कोई रात भर सिसकियों से झुझना नहीं जानता,
शमा-परवाने कि दास्ताँ बहुत पुरानी हो चुकी है,
हीर-रांझा को कोई नहीं पहचानता!!!
तो, हे बादल, तुम क्यों पुरानी बेड़ियाँ नहीं तोड़ डालते???
तुम्हारा काम है बरसना, न कि , किसी तरसती आँखों को देख विचलना है,
तुम जाओ, बरसो अपना कर्म संपन्न करो,
दूसरों के लिए तड़पना, अपने कर्म कि परवाह न करना ठीक नहीं,
तुम्हे भी तो बरखा को मुक्त करके, सागर कि लहरों में मिलाना है,
एक अदना बिरहन के लिए, उन दो सच्चे प्रेमियों को मिलने से क्यों रोकते हो?
कहती है आज करिश्मा, सच्चा प्रेम आज प्रकृति में ही विद्यमान है,
सांसारिक लोभ-माया से क्यों अपना सर फोड़ते हो?
तुम आओ… मचलो… झूमो… नाचो….
पर, बिरहन को दृष्टि से ओझल कर
रिमझिम पानी बरसाओ,
हे बादल आओ, आज झूम- झूम के बरस जाओ।
-करिश्मा