वास्तविकताओं से अब, डर सा लगता है,
अपनों की महफ़िल में, हर चेहरा,अजनबी सा लगता है।
लगता है, मानो, पृथ्वी का भार आ गया है सीने पर,
भावनाएं गले में जैसे अटक सी गयीं हैं,
हर चेहरे का दुःख, अपना सा लगता है,
वास्तविकताओं से अब, डर सा लगता है।
जब हवा चलती है, तो मानो
जान छुड़ा कर भाग रही हो शत्रु के शिकंजे से,
पत्ती जब खड़गती है, तो मानो
खुद को उसने बेमन जोड़ा हुआ है पौधे से,
ज़रूरी तो नहीं, हवा का वेग, उसकी प्रवृत्ति है,
ज़रूरी तो नहीं, पत्ती का पौधे से जुड़े रहना उसकी नियति है,
आसमां के तारों का टिमटिमाना उसका रुदन लगता है,
वास्तविकताओं से अब, डर सा लगता है।