Wednesday, June 24, 2020

"मन क्षितिज हो चला है"

"मन क्षितिज हो चला है"

दूर तलक तकती आँखें,
एक साया सा टटोल रही हैं।
कुछ तो है, जो , खींच रहा है!
अपने अस्तित्व को उभारता सा,
कभी लगता है "करिश्मा"
मन क्षितिज सा हो चला है।

कुछ होने का अहसास सा है, एक आभास सा है,
मानो एक राह बुला सी रही फिर जीने के लिए,
हर मोड़ पर किसी की आहट सी है,
मृग सी हर पल आँखें मेरी,
दौड़ सी लगा रहीं है मरीचिका की तलाश में,
मन में सवाल हज़ारों हैं, क्या करूँ मैं,
मन क्षितिज सा हो चला है।

आँखें मरीचिका को तलाशती हैं,
दिल कहता है किस पर अब ऐतबार कर लूँ,
मस्तिष्क किसी की आहट  से झंकृत है,
किसी नयी सुबह की शुरुआत के लिए,
एक अनजान सा साया थकी आँखों को थामता सा,
अनजान बेबसी सी है, क्या करूँ मैं,
मन क्षितिज सा हो चला है।

-करिश्मा पाल




Monday, June 22, 2020

काश

                    काश 
काश मैं पंछी होती,
फुर्र से विचलती मचलती स्वच्छंद नभ में,
तिनका- तिनका जोड़, नीड़ बनाती, 
स्वतंत्रता से पंख फैलाये इठलाती घूमती। 

काश मैं तितली होती,
फूलों का रंग मेरा अपना होता,
गुलाब- चमेली मेरी सहेली होतीं, 
पराग फूलों का ले झोली भर्ती,
एक फूल से दूजे पर मद मस्त उड़ती रहती। 

काश मैं चील होती,
आकाश की ऊंचाई से दुश्मन दबोचने में सक्षम होती,
असलियत सबकी सामने होती, तो 
किसी से कोई इक्षा-तमन्ना भी न होती। 

काश कि मैं मैं न होती,
वो होती जो मैं नहीं हूँ, 
फिर जैसी भी मैं होती,
संभवत: या निश्चितत:
आज से तो मैं बेहतर ही होती. 

- करिश्मा पाल 
06.09.1996