दीया जलाती मैं
शिक्षित गंवार सी,
पर्व मनाने को बेताब सी।
सहसा,
तस्वीर उभरी लौ में,
उस बेबस पीड़ित की,
महामारी की घुटन में
सांसों के लिए मोहताज इंसान की।
तस्वीर उभरी उस की,
आँखे दारुण कथा बाँझती जिसकी।
मैं भी तो ज़ोरो से घंटे बजा रही थी
याद आयी मुझे अपनी ही ताली
दर्द उभर सा गया,
भूख से आकुल पेट ताक रहा था
जब अपनी खाली थाली।
बेबस, 'करिश्मा' पिंजरे में कैद
ज़िंदगी बचाने को आतुर
दो पल खुशियों के अपनों के साथ बिताकर।
(:अर्थ:गंवार, यहाँ उस व्यक्ति के लिए प्रयुक्त जो शिक्षित होकर भी अनजान बना हुआ है)
- करिश्मा पाल
No comments:
Post a Comment