Wednesday, June 24, 2020

"मन क्षितिज हो चला है"

"मन क्षितिज हो चला है"

दूर तलक तकती आँखें,
एक साया सा टटोल रही हैं।
कुछ तो है, जो , खींच रहा है!
अपने अस्तित्व को उभारता सा,
कभी लगता है "करिश्मा"
मन क्षितिज सा हो चला है।

कुछ होने का अहसास सा है, एक आभास सा है,
मानो एक राह बुला सी रही फिर जीने के लिए,
हर मोड़ पर किसी की आहट सी है,
मृग सी हर पल आँखें मेरी,
दौड़ सी लगा रहीं है मरीचिका की तलाश में,
मन में सवाल हज़ारों हैं, क्या करूँ मैं,
मन क्षितिज सा हो चला है।

आँखें मरीचिका को तलाशती हैं,
दिल कहता है किस पर अब ऐतबार कर लूँ,
मस्तिष्क किसी की आहट  से झंकृत है,
किसी नयी सुबह की शुरुआत के लिए,
एक अनजान सा साया थकी आँखों को थामता सा,
अनजान बेबसी सी है, क्या करूँ मैं,
मन क्षितिज सा हो चला है।

-करिश्मा पाल




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