हाल ही मे television पर प्रदर्शित कुछ धारावाहिक राजनैतिक पार्टियो की आंखों मेंकिरकिरी बन गए हैं , जिनमें सर्वप्रमुख है - बालिका वधु। मुझे यह समझ नहीं आता की इन कार्यकर्मों मे काम करने वाले बच्चो को किस आधार पर बाल मजदूरों कींश्रेणी मे रखा जा रहा है । कोई कलाकार यदि अपनी प्रतिभा को और पोषित करता है तो समाज का कर्तव्य बनता है कि उसे अधिक प्रोत्साहन दे। शायद यही कारण ध्यान मे रखते हुए संविधान निर्माताओं ने ये व्यवस्था बनाई कि माननीय राष्ट्रपति कला से सम्बद्ध लोगों को राज्यसभा मे मनोनीत करें। परन्तु विडम्बना ये है की रोजाना समाज को अपनी मानसिकता से प्रदूषित करने वाला वर्ग इस प्रकार के विचारों का न केवल पोषण कर रहा है वरन पार्लियामेंट की गरिमा को धूमिल भी कर रहा है।
बचपन से हमें सिखाया जाता है की "करत - करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान ,रसरी आवत जात ते सिल पर परत निसान।" अर्थात लगातार अभ्यास करने से प्रवीणता प्राप्त हो जाती है इसीलिए व्यक्ति को सदैव अभ्यास करना चाहिए.जो बालक किसी कला मे पारंगत है तो उसे उक्त कला का निरंतर अभ्यास करना चाहिए वरना कितने ही लोग ऐसे होते हैं जो साधनों और अवसर के अभाव मे अपनी प्रतिभा को दुनिया के सामने नही ला पाते।
फ़िल्म इंडस्ट्री ने शुरू से ही बाल कलाकारों को अवसर प्रदान किया है जिसके परिणाम से बेबी तबसुम, शशि कपूर , ऋषि कपूर जैसे न जाने कितने ही बालको को अपनी प्रतिभा के प्रदर्शन का अवसर मिला और वो एक मुकाम हासिल कर पाये। मेरा नाम जोकर, आखरी ख़त, हकीकत, मासूम, मदर इंडिया जैसी नायाब फिल्मों ने कीर्तिमान बनाए, सबसे बड़कर स्लुम्दोग मिल्लेनिओरे जिसने न केवल भारत बल्कि दुनिया में सबसे ज़्यादा ऑस्कर अवार्ड जीतकर तहलका मचा दिया जो पूरी तरह बाल प्रतिभाओं पर आधारित थी , स्माइल पिंकी का नाम भी अविस्मरनीय रहेगा।
बालकों की प्रतिभा को बाल मजदूरी के दायरे में लाना कला का अपमान है, अमानवीय कृत्य है । समाज के प्रत्येक जागरूक नागरिक का कर्तव्य बनता है की ऐसी प्रदूषित मानसिकता के विरुद्ध आवाज़ उठायें और गन्दी राजनीती को पोषित न करके स्वतंत्र विचारों के साथ भावी पीडी के पैरों के ज़ंजीर न बंधने दे।