Friday, September 13, 2019

डर लगता है

             डर लगता है 

वास्तविकताओं से अब डर सा लगता है,
अपनों की महफ़िल में हर चेहरा अजनबी सा लगता है,

लगता है,
पृथ्वी का भार उतर आया है सीने पे,
भावुकता गले में कहीं अटक सी गयी है.
हर चेहरे का दुःख कुछ अपना सा लगता है.

जब हवा चलती है, तो,
लगता है, जान छुड़ा कर भाग रही है,

वही हवा पत्ती को झकझोर देती है,
मानों पौधे से बेमन जुडी हुई है.

ज़रूरी तो नहीं, हवा का वेग उसकी प्रवृत्ति है.
ज़रूरी तो नहीं, पत्ती का पौधे से जुड़े रहना उसकी नियति है.

मुझे तो आसमान के तारों का टिमटिमाना भी रुदन लगता है,
तभी तो जब तब रात के सन्नाटे को चीरता हुआ,
चुपके से एक तारा आसमान से गिरता है.

विडंबना है "करिश्मा"
संसारी माया में उलझ, मुक्ति सरल नहीं है,
कलियुग में कोई महावीर या बुद्ध नहीं है,

पत्तियां कितनी प्रसन्न हैं पौधे से टूट कर
इसका कोई अनुमान नहीं है.

छल- कपट आज पर्याय बन चुके हैं धैर्य- संयम के,
मित्रता सिर्फ चार दिनों की कहानी है,
प्रीत भी बस एक छलावा है,

फिर भी,

मृगमरीचिका सी माया के पीछे भागता इंसान,
मुक्ति की दुनिया से पिंड छुड़ाता सा लगता है,

तभी तो, वास्तविकताओं से

डर लगता है.

( I wrote this poem on 20th day of june in the year 1996)


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