सम्प्रति, मातृशक्ति अर्थात महिलाएं सम्पूर्ण विश्व की लगभग आधी जनसँख्या का प्रतिनिधित्व करने के क्रम में अपनी प्रतिभा, क्षमता, बौद्धिकता एवं योग्यता का परचम लहराने में सफल हो रही हैं. चाहे वैज्ञानिक शोध अभिकल्प हों, चिकित्सा, अभियांत्रिकी, शासन-प्रशासन, विधि, रक्षा आदि हो या फिर अभिनय, गायिकी, नृत्य, कला आदि हो, महिलाएं समस्त क्षेत्रों में पुरुषों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर चलती नज़र आ रही है और अपनी स्थिति को आलोकित कर रही हैं. किन्तु, दूसरी और यदि आईने को पलट कर देखा जाये तो आत्मा सिहर उठती है. परिस्थितिवश, आज भी एक बड़े अनुपात में महिलाएं असुरक्षित हैं, अपने आत्मसम्मान, गौरव, गरिमा एवं प्रतिष्ठा की लड़ाई में दम तोड़ती सिसकियाँ लेती दिखाई पड़ रही हैं. रात के अंधकार में तो कभी दिन के सन्नाटे में एक बेबस चीत्कार आत्मा को झंझोर रही है, शायद ऐसी स्थिति को ध्यान में रखा कर ही महान कवि मैथिलि शरण गुप्त ने वर्षों पूर्व महिलाओं की दयनीय स्थिति का चित्रण कुछ इस प्रकार किया:
" अबला जीवन, हाय, तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में दूध आँखों में पानी"
दुर्भाग्यवश आज भी उपरोक्त पंक्तियाँ प्रासंगिक हैं.इक्कीसवी शताब्दी का लगभग दूसरा दशक अंतिम चरण में है किन्तु आज भी ऐसा प्रतीत होता है कि मानव अपने बौद्धिक स्तर का विकास किस दिशा में कर पाया है, जो कि समझ से परे है. एक ओर चाँद को छूने के लिए बुद्धि का चरम प्रदर्शन तो दूसरी ओर एक बच्ची, एक महिला को हाड- मांस का लोथड़ा समझ कर अपनी कामुकता को शांत करने का सिलसिला, दोनों स्थितियां एक दम विपरीत स्थिति की ध्योतक हैं. अख़बार एक ओर तो चंद्रयान की गौरव गाथा से लिपे पुते रहते हैं या फिर महिलाओं के साथ निर्लज्जता करने वाले खबरनामों से. चाहे उन्नाव हो, कठुआ हो, दिल्ली हो या देश का कोई शहर हो, महिलाये कहीं सुरक्षित दिखाई नहीं पड़तीं. जब- जब ऐसी घटनाएं मानव सभ्यता को शर्मसार करती हैं तब - तब समाज के प्रबुद्ध कहलाने वाले मुट्ठी भर लोग कैंडल मार्च करते हैं तो कहीं राजनीति की रोटियां सेंकते नज़र आते हैं. नज़र नहीं आते हैं वो लोग जिनको वाकई अपनी बहन बेटियों को दूषित नज़रों से बचाना है या अन्य लोगों की बहन बेटियों को अपनी बहन बेटी की दृष्टि से देखना है.
वास्तव में, भारतीय समाज निषेधों को अत्यंत महत्त्व देता है जिसके कारण महिलाओं को अपने प्रति हो रही समस्याओं को सामाजिक भय के कारण छुपाने की प्रवृत्ति सिखाई जाती है. इस विषय पर किये जा रहे अनुसंधानों में पाया गया है कि एक बड़ी संख्या में अबोध लड़कियां अपने ही घर में अपने रिश्तेदारों के यौन लिप्सा का शिकार होती रहती हैं और समाज के डर से अपने प्रति हो रहे अपराध को वह उजागर नहीं कर पाती हैं. इसके अतिरिक्त पुरुषों को अत्यंत विशेषाधिकार प्राप्त होने के कारण वह महिलाओं को अपनी लिप्सा मिटाने का साधन समझते हैं. विडंबना तो ये है कि मानसिक रूप से दूषित लोग अबोध शिशुओं को अपना शिकार बनाते हैं. मनोचिकित्सकों का मानना है कि ऐसे अपराधी मानसिक रूप से बीमार होते हैं जिनका शिकार नन्ही बच्चियां बनती हैं.
कालांतर में एक सरसरी निगाह दौड़ाएं तो पाते हैं कि महिलाओं की इस व्यथित स्थिति के लिए उत्तरदायी वह श्रम- विभाजन की व्यवस्था बन गयी है जो कि तत्कालीन परिस्थितियों को दृष्टिगत करके बनायीं गयी थीं. पुरुष शिकार करके भोजन संग्राहक तो बन सकते थे किन्तु जननी का कार्य उनके बस में नहीं था और बच्चों की आवश्यकता को पूरा करने का कार्य भी महिलाओं के द्वारा ही किया जा सकता था. ईश्वर ने महिलाओं को शारीरिक रूप से सुन्दर, कोमल बनाने के साथ धैर्य, संयम तथा ममतत्व के ऐसे गुणों से सजाया है कि वह उन सभी कार्यों को सफलता पूर्वक करने में सक्षम रही जो कि पुरुषों के लिए दुर्गम प्रतीत हो रहे थे. अत: प्रकृति के गुणों से औत प्रोत मातृशक्ति को गृह व्यवस्था का कार्य सौंपा गया जबकि पुरुषों ने भोजन की व्यवस्था एवं सुरक्षा आदि को अपने जिम्मे लिया. समय के साथ उक्त व्यवस्था में स्थायित्व के लक्षण आने पर अधिशेष उत्पादन ने पुरुषों को आराम करने तथा संग्राहक के अतिरिक्त अन्य तथ्यों की और अग्रसर किया. जबकि महिलाओं का कार्य कभी कम नहीं हुआ, वह मात्र बच्चों के लालन पालन, बुज़ुर्गों की एवं रोगियों की देखभाल, भोजन बनाने, अतिथियों का सत्कार एवं घर को व्यवस्थित करने में व्यस्त रहीं. परिणाम हुआ कि विचारों में आंदोलन होने प्रारम्भ हुए जिनकी परिणति हुई सकारात्मकता एवं नकारात्मकता का उदय. सकारात्मकता ने कोटि-कोटि ग्रंथों, साहित्यिक रचनाओं, अनुसंधानों, अन्वेषणों आदि को पराकाष्ठा पर पहुँचाया तो दूसरी और नकारात्मकता ने दुर्गुणों का जमावड़ा जमा दिया जैसे- चोरी, ईर्ष्या, लालच, दुर्भावना,काम-वासना आदि. इन नकारात्मक तत्वों ने समाज के विकास में स्वयं को प्रतिष्ठापित कर डाला जिसको अलग करना दुष्प्राय हो गया. पुरुष प्रधान समाज में परिवार को सुख देने के लिए सदैव प्रयासरत महिला जान ही नहीं पायी कि जिस पुरुष प्रधान समाज के प्रति कृत संकल्प हो वह अपने कर्त्तव्यों का निर्वहन कर रही है उसी समाज ने चुपके से उसको दबाने के लिए कैसी-कैसी व्यवस्थाओं को जन्म दे दिया. सामाजिक विभाजन, वर्ण विभाजन, रंग भेद, लिंग भेद, साम्प्रदायिकता, नस्ल भेद आदि ऐसे तत्व हैं जो कि समाज में रंग बस चुके हैं. महिलाओं को संपत्ति समझ कर महान राजाओं तक ने उनको जुए में झोंक दिया. अश्वमेध यज्ञ करवा कर अपने पराक्रम एवं शौर्य की प्रतिष्ठापना हेतु यज्ञ के घोड़े के साथ अपनी पटरानी को सोने की मुद्रा में रहने को विवश किया. कामेष्ठि यज्ञ, नियोग प्रथा, धर्माणी प्रथा, सती प्रथा, बाल विवाह, बेमेल विवाह, जौहर प्रथा, पर्दा प्रथा आदि न जाने कितनी ही प्रथाओं का अनुसरण बेबस महिलाओं से करवाया गया. इन सब स्थितियों से आहत समाज सुधारकों ने महिलाओं के उत्थान के लिए नि: संदेह प्रयास किये जिसके लिए राजा राम मोहन रॉय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर,दयानन्द सरस्वती, ज्योतिबा फुले, आदि का योगदान अविस्मरणीय रहेगा.
इसी क्रम में महिलाओं की सामाजिक प्रस्थिति को बेहतर बनाने के क्रम में कतिपय कानून बनाये गए- यथा: बंगाल सती प्रथा उन्मूलन अधिनियम, 1829, फीमेल इंफेंटिसायड प्रिवेंशन अधिनियम, 1870,ऐज ऑफ़ कंसेंट एक्ट 1891, आदि. कतिपय अधिनियमों एवं नियमों को ध्यान में रखते हुए स्वतंत्रता प्राप्ति पश्चात् विधायन के अंतर्गत भारतीय संविधान के द्वारा महिलाओं को पुरुषों के समतुल्य प्रस्थिति प्रदान करने के क्रम में कतिपय अनुच्छेद निर्मित किये गए जिनके अनुसार महिलाओं को पुरुषों के भांति समान अधिकार प्रदान करने का महान कार्य किया गया. अनुच्छेद 14 के द्वारा महिलाओं को पुरुषों के समान दर्जा दिया गया, अनुच्छेद 15(1) के अंतर्गत राज्य महिलाओं के प्रति भेदभाव नहीं करेगा, अनुच्छेद 16 राज्य महिलाओं को रोजगार के समान अवसर देगा, अनुच्छेद 39(d) एवं अनुच्छेद 42 कदाचित समान कार्य हेतु समान वेतन की प्रतिष्ठापना हेतु प्रावधान करते हैं.अनुच्छेद 15(3) राज्य को महिलाओं से सम्बंधित विशेष प्रावधान निर्मित करने की शक्ति प्रदान करता है तो अनुच्छेद 51(A)(e) महिलाओं के गौरव के विरूद्ध समस्त प्रथाओं का विरोध करता है.अनुच्छेद 42, प्रावधान करता है कि राज्य काम करने वाली महिलाओं की सुरक्षा तथा मानवीय प्रबंध करे तथा मातृत्व अवकाश भी प्रदान करे. इसके अतिरिक्त भारतीय वैधानिक व्यवस्था में साक्ष्य अधिनियम, दंड संहिता एवं भारतीय दंड संहिता में विविध प्रावधान महिलाओं की सुरक्षा एवं मान सम्मान को ध्यान में रख कर बनाये गए हैं. यही नहीं, भारतीय सरकार समय समय पर कानून बना कर अथवा अन्य तरीकों से महिला सशक्तिकरण को सबल बनाने का प्रयास करती रही है जिसके क्रम में वर्ष 2001 को महिला सशक्तिकरण वर्ष घोषित किया गया साथ ही उसी वर्ष महिला सशक्तिकरण से सम्बंधित राष्ट्रीय नीति भी बनाई गयी. सरकार के द्वारा निरंतर किये जा रहे प्रावधानों के बावजूद भारतीय समाज में महिलाओं का जीवन नारकीय एवं दयनीय होता जा रहा है. वर्ष 2011 में थॉमसन रूटर फाउंडेशन द्वारा किये गए अनुसन्धान में अफ़ग़ानिस्तान, कांगो एवं पाकिस्तान के बाद भारत को महिलाओं के लिए चौथा सर्वाधिक खतरनाक देश बताया गया.पुन: वर्ष 2017 में थॉमसन रूटर फाउंडेशन द्वारा 40 शहरों में से दिल्ली शहर को महिलाओं के लिए चौथा सर्वाधिक खतरनाक शहर बताया गया. इसके अनुसार दिल्ली में यौन अपराध, बलात्कार तथा अन्य प्रकार के अपराध अत्यधिक पाए जाते हैं जो कि महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से कदाचित स्वीकार्य नहीं हो सकते. स्वयं नेशनल क्राइम रिकार्ड्स ब्यूरो ऑफ़ इंडिया का मानना है कि देश में प्रत्येक तीन मिनट में महिलाओं के प्रति कोई न कोई अपराध किया जाता है. जबकि प्रत्येक 20 मिनट में बलात्कार का शिकार बनती हैं.
राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर आ रहे नकारात्मक रिकॉर्ड को ध्यान में रख कर भारत सरकार समय समय पर कानूनों में संशोधन कर रही है अथवा नए प्रावधान बनाने को मजबूर है. इस कड़ी में 2011 में थॉमसन रूटर फाउंडेशन द्वारा प्रेषित रुझान से पूर्व ही 9 मार्च 2010 को राज्य सभा के द्वारा महिला आरक्षण बिल पास करके महिलाओं को 33 % आरक्षण भारतीय संसद एवं अन्य विधायिकाओं में प्रदान किया गया. इसी प्रकार, देश में बढ़ते यौन अपराधों के प्रति जनता के सड़क पर उतर जाने के पश्चात् सेक्सुअल हरासमेंट ऑफ़ वीमेन एट वर्कप्लेस ( प्रिवेंशन, प्रोहिबिशन एंड रिड्रेसल) एक्ट 2013 पारित किया गया जिसके द्वारा कामगार महिलाओं की कार्यस्थल पर सुरक्षा सम्बन्धी प्रावधान किये गए. इसके अतिरिक्त दंड प्रक्रिया संहिता में संशोधन करके भारतीय दंड संहिता,1860 की धारा 354(स्त्री की
लज्जा भंग करने के आशय से उस पर हमला या आपराधिक बल का प्रयोग करना) को यौन अपराधों के लिए विशेष शक्ति देते हुए तीन साल की सजा एवं आर्थिक दंड का प्रावधान भी किया गया है.
भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अपराध के लिये भारतीय दंड संहिता में धारा 376 के तहत सजा का प्रावधान भी दिया
गया है। जब कोई पुरुष किसी महिला के साथ उसकी इच्छा के विरुद्ध, उसकी सहमति के बिना, उसे डरा धमका कर, दिमागी रूप से कमजोर या पागल महिला को धोखा देकर या उस महिला के शराब या नशीले पदार्थ के कारण होश में नहीं होने पर संभोग करता है, तो उसे बलात्कार कहते
हैं। इसमें चाहे किसी भी कारण से संभोग क्रिया पूरी हुई हो अथवा नहीं, कानूनन वो बलात्कार की श्रेणी
में ही रखा जायेगा। यदि महिला की उम्र 16 वर्ष से कम है, तो उसकी सहमति या बिना सहमति से होने वाला संभोग भी बलात्कार के अपराध
में ही गिना जाता है।
इस अपराध को अलग - अलग हालात और श्रेणी के हिसाब से भारतीय दंड संहिता में इसे धारा 375 (क), 375 (ख), 375 (ग), 375 (घ) के रूप में विभाजित किया गया है। भारतीय दंड संहिता की धारा 375 और धारा 376 दोनों एक दूसरे के लिए ही बनाई गयी हैं, इनमें धारा 375 में बलात्कार की परिभाषा को समझाया गया है, और धारा 376 में एक व्यक्ति द्वारा किसी महिला के साथ बलात्कार करने की सजा के बारे में बताया गया है।
इस अपराध को अलग - अलग हालात और श्रेणी के हिसाब से भारतीय दंड संहिता में इसे धारा 375 (क), 375 (ख), 375 (ग), 375 (घ) के रूप में विभाजित किया गया है। भारतीय दंड संहिता की धारा 375 और धारा 376 दोनों एक दूसरे के लिए ही बनाई गयी हैं, इनमें धारा 375 में बलात्कार की परिभाषा को समझाया गया है, और धारा 376 में एक व्यक्ति द्वारा किसी महिला के साथ बलात्कार करने की सजा के बारे में बताया गया है।
376(क)-यदि कोई व्यक्ति किसी
भी प्रकार के
विभाजन के तहत
अलग रहने के
दौरान अपनी पत्नी
के साथ उसकी
मर्जी के विरुद्ध संभोग
करता है तो
वो भी बलात्कार की
श्रेणी में ही
आता है। जिसके
लिए कानून में
दो वर्ष तक
की सजा और
आर्थिक दंड का
प्रावधान दिया गया है।
376(ख)यदि किसी सरकारी
कर्मचारी द्वारा उसकी हिरासत
में किसी भी
स्त्री के साथ
संभोग किया जाता
है, तो इस
दुष्कर्म को बलात्कार के
अपराध की श्रेणी
में गिना जाएगा।
जिसके लिए भारतीय
दंड संहिता, 1860 के अनुसार
पांच वर्ष तक
की जेल की
सजा के साथ
आर्थिक दंड भी
देना पड़ेगा।
376(ग) जब कोई अधिकारी, सरकारी
कर्मचारी, जेल, रिमांड होम,
हिरासत के किसी
अन्य स्थान, स्त्रियों या
बालको की संस्था
का अधीक्षक या
प्रबंधक या अस्पताल का
कर्मचारी होते हुए, ऐसी
किसी स्त्री, जो
की उसकी हिरासत
में है या
उसके अधीन है
या परिसर में
उपस्थित है उस स्त्री
को अपने साथ
शारीरक सम्बन्ध बनाने
के लिए उत्प्रेरित करने
लिए अपनी शक्ति
का दुरूपयोग करता
है, तो उस
व्यक्ति को पांच साल
या दस साल
की कारावास की
सजा से दण्डित
किया जाता है
और जुर्माने से
भी दण्डित किया
जा सकता है।
376(घ)जहाँ किसी स्त्री
के साथ एक
या एक से
अधिक वयक्तियों द्वारा
मिलकर या समूह
बना कर सामूहिक बलात्कार किया
जाता है, तो
उन सभी व्यक्तियों में
से प्रत्येक व्यक्ति के
बारे में यह
समझा जायेगा की
उसने बलात्कार का
अपराध किया है।
ऐसे में दोषी
अपराधियों को न्यायलय द्वारा
दण्डित किया जायेगा,
जो की बीस
साल की कारावास की
सजा या आजीवन
कारावास की सजा और
जुर्माने के साथ भी
दण्डित किया जाएगा।
लेकिन ऐसा जुर्माना पीड़िता
के चिकित्सीय खर्चो
को पूरा करने
और पुनर्वास के
लिए न्यायोचित होगा।
फिलहाल में
ही दिल्ली हाईकोर्ट ने आदेश
दिया है कि 15 वर्ष से कम उम्र की लड़की के साथ विवाह के बाद जब संभोग होता है, तो उसे बलात्कार ही माना
जाएगा। हाईकोर्ट ने कहा
है कि संभोग के लिए भले ही लड़की की रजामंदी हो या न हो, तब भी इसे बलात्कार ही माना
जाएगा, और ऐसे मामलों में पुरुष को उसके धार्मिक अधिकारों के तहत
कोई भी संरक्षण हासिल नहीं है। तत्कालीन मुख्य
न्यायाधीश ए. के. सीकरी की अध्यक्षता वाली
तीन सदस्यीय पीठ का कहना था कि, ''15 वर्ष से कम उम्र की पत्नी के साथ संभोग आई. पी. सी. की धारा 376 के तहत एक अपराध है। इस कानून के विषय में कोई अपवाद नहीं हो सकता है और इसे सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।''
यद्यपि
भारत में महिलाओं के प्रति हो रहे यौन अपराधों को लेकर कतिपय कानून बनाये गए हैं एवं संशोधन भी किये गए हैं किन्तु उक्त कानून लम्बी क़ानूनी प्रक्रिया के कारण
कारगर सिद्ध नहीं हो पा रहे हैं. अभी भी बहस होती है कि नाबालिग के साथ बालिग पर लगने वाला दंड आरोपित नहीं किया जा सकता जबकि नाबालिग या बालिग़ बेशर्मी से अबोध शिशु बालिकाओं के साथ
बलात्संग करने लायक समझ रखते हैं. ऐसे ढुलमूल विचारों के कारण अपराधी और शातिर हो रहे हैं और अपराधों में वृद्धि भी उसी गति से बढ़ रही है.
यौन
अपराधों की तीव्र गति के लिए कई आलोचक मानते हैं कि समाज में शिक्षा एवं खुले विचारों के कारण इस प्रकार के अपराधों को चुपचाप झेलने वाली महिलाये शिकायतें करने
लगी हैं जिस कारण आंकड़ों में वृद्धि दिखने लगी है. ऑस्टिन का मानना है कि दंड के भय से व्यक्ति अपराधों से विरत रहता रहता है तथा दंड हल्का फुल्का होगा तो अपराधों की संख्या में वृद्धि होगी क्योंकि अपराधियों को शास्ति
का भय नहीं होगा. यदि अंतर्राष्ट्रीय स्तर
पर अध्ययन करें तो पाएंगे कि यौन अपराध सम्बन्धी भारतीय
कानूनों को और कठोर बनाये जाने की आवश्यकता है. चीन
जैसे देश में उक्त केसों में मेडिकल जांच की पुष्टि होने के बाद सीधे मृत्यु दंड दे दिया जाता है. इंडोनेशिया में
अपराधी को नपुंसक बना दिया जाता है, पोलैंड में आरोपी को सूअरों से कटवा कर मरवा दिया जाता है, जबकि, इराक में आरोपी को पत्थरों से मार- मार कर हत्या,सऊदी अरब में फांसी, सर कलम करने के साथ साथ आरोपी के यौनांगों को काट
दिया जाता है. इसी प्रकार उत्तरी कोरिया में अपराधी के सर पर सीधे गोली मार दी जाती है.
भारतीय
कानूनों का सख्त न होना, परिवारवाद, लम्बी
क़ानूनी प्रक्रिया, समाज
का भय, आदि कई कारक साथ मिलकर देश में यौन अपराधों की फेहरिस्त को दिन
दूना रात चौगुना कर रहे हैं. ऐसी स्थिति में प्रत्येक नागरिक
का परम कर्त्तव्य बनता
है कि यथासंभव अपराध होने से पूर्व ही अपराधी को सचेत करे, व्यावहारिक निषेध,
लाज, परिवार का मान सम्मान आदि की रक्षा करते समय परिवार की प्यारी बच्चियों, बहनों,
माताओं के मान सम्मान का भी ध्यान रखें. आपराधिक मनोवृत्ति वाले
व्यक्ति को मान सम्मान देकर उसके आपराधिक होंसलों को न बढ़ाया जाये.
भारत
वह देश है जो कि भारत माता के नाम से जाना जाता है और ऐसे देश में महिलाओं के साथ हो रहे यौन अपराध वाकई शर्मनाक एवं दुर्भायपूर्ण हैं.
यदि सभी नागरिक अपने घर के बालकों को महिला का सम्मान करना सीखा देंगे, उस दिन से महिलाओं के साथ हो रहे यौन अपराधों में स्वत: कमी आ जाएगी. अंतत: मैथिलीशरण गुप्त
की अबला नारी का चित्रांकन करने
के बजाये समाज को उन संस्कारों एवं
मूल्यों की याद दिलानी होगी जिसमें नारी को एक महत्वपूर्ण स्थान
दिया गया, यथा:
“यत्र
नार्यस्तु पूज्यन्ते, रमन्ते
तत्र देवता:”
अर्थात,
जहाँ महिलाओं को सम्मान के रूप में पूजा जाता है वहाँ ईश्वर की प्रतिष्ठापना होती
है. और जहाँ ऐसा नहीं किया जाता वहां समस्त कार्य निष्फल हो जाते हैं. उम्मीद है कि आने वाले समय में क़ानूनी
प्रावधानों व सामाजिक जागरूकता के साथ
मानवीय विचारों, मूल्यों एवं मान सम्मान की भावना संभवत: आगामी पीढ़ी को महिलाओं के प्रति आदर की भावना का उत्सर्जन कर पाए
तथा संस्कारों से लैस
हो कर पुरुष महिलाओं को उपभोग का साधन समझने के बजाय समाज का एक महत्वपूर्ण अवयव
मान पाएंगे.
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करिश्मा पाल
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