“आज बरस जाओ”
नभ पर बादल झूम- झूम जाते हैं,
काली घटाएं हवाओं के संग मचल-मचल जाती हैं,
मौसम अपनी जवान उमंगों से प्रफुल्लित हुआ जाता है,
पर, बिरहन के सूखे आंसूं देख- देख कर, हाहाकार कर,
हे बादल, तुम क्यूँ लौट जाते हो ?!?
तुम्हारी रवानी , तुम्हारी शोखी,
एक अदना सी बिरहन के दुःख से विचलित हो,
तुम बरसना क्यूँ भूल जाते हो?
जीवन का खेल ही अद्भुत है,
कोई तो बादलों कि गर्जनाओं को भूल कर,
बारिश के पानी में भीग-भीग कर
उफनती नदी को भी अदना समझ पार कर, प्रिय-मिलन को बैचैन है,
तो कोई, चाह के भी , नजदीकी के बावजूद मिलन से कोसों दूर है।
आज कोई सोहनी फिर से नहीं जनमती,
फिर कोई महिवाल सोहनी के लिए नहीं तड़पता,
तो हे बादल, तुम क्यों उस बिरहन का गुमसुम चेहरा देख विचलित हो लौट जाते हो?
आज का काल ही कुछ ऐसा बन चुका है,
सच्चे प्रेमी बिरहा ही सहते रह जाते हैं,
न तो कोई किसी के लिए जीता है,न ही मरता है,
न ही जान पर खेल कर कोई पृथ्वीराज आज संयोगिता को संगिनी बनाता है।
प्रेम के मायने मात्र एक लालच, एक तृष्णा बन चुके हैं,
सच्चाई सबसे दूर, कुछ ही के निकट है,
तो वो 'कुछ ही आँखों से आंसूं सुखा लेते हैंपर हे बादल, तुम क्यों नियति भुला शोखी भुला आते हो ?तुम तो जन्मे ही हो सुख देने के लिए
तुम पर संभवत: अब तक नव काल कि छाया नहीं नहीं, क्योंकि,
विचलन- तड़पन संसार से उठ गयी है,
कोई भी दुसरे के लिए तड़पना नहीं जानता,
कोई रात भर सिसकियों से झुझना नहीं जानता,
शमा-परवाने कि दास्ताँ बहुत पुरानी हो चुकी है,
हीर-रांझा को कोई नहीं पहचानता!!!
तो, हे बादल, तुम क्यों पुरानी बेड़ियाँ नहीं तोड़ डालते???
तुम्हारा काम है बरसना, न कि , किसी तरसती आँखों को देख विचलना है,
तुम जाओ, बरसो अपना कर्म संपन्न करो,
दूसरों के लिए तड़पना, अपने कर्म कि परवाह न करना ठीक नहीं,
तुम्हे भी तो बरखा को मुक्त करके, सागर कि लहरों में मिलाना है,
एक अदना बिरहन के लिए, उन दो सच्चे प्रेमियों को मिलने से क्यों रोकते हो?
कहती है आज करिश्मा, सच्चा प्रेम आज प्रकृति में ही विद्यमान है,
सांसारिक लोभ-माया से क्यों अपना सर फोड़ते हो?
तुम आओ… मचलो… झूमो… नाचो….
पर, बिरहन को दृष्टि से ओझल कर
रिमझिम पानी बरसाओ,
हे बादल आओ, आज झूम- झूम के बरस जाओ।
-करिश्मा
नभ पर बादल झूम- झूम जाते हैं,
काली घटाएं हवाओं के संग मचल-मचल जाती हैं,
मौसम अपनी जवान उमंगों से प्रफुल्लित हुआ जाता है,
पर, बिरहन के सूखे आंसूं देख- देख कर, हाहाकार कर,
हे बादल, तुम क्यूँ लौट जाते हो ?!?
तुम्हारी रवानी , तुम्हारी शोखी,
एक अदना सी बिरहन के दुःख से विचलित हो,
तुम बरसना क्यूँ भूल जाते हो?
जीवन का खेल ही अद्भुत है,
कोई तो बादलों कि गर्जनाओं को भूल कर,
बारिश के पानी में भीग-भीग कर
उफनती नदी को भी अदना समझ पार कर, प्रिय-मिलन को बैचैन है,
तो कोई, चाह के भी , नजदीकी के बावजूद मिलन से कोसों दूर है।
आज कोई सोहनी फिर से नहीं जनमती,
फिर कोई महिवाल सोहनी के लिए नहीं तड़पता,
तो हे बादल, तुम क्यों उस बिरहन का गुमसुम चेहरा देख विचलित हो लौट जाते हो?
आज का काल ही कुछ ऐसा बन चुका है,
सच्चे प्रेमी बिरहा ही सहते रह जाते हैं,
न तो कोई किसी के लिए जीता है,न ही मरता है,
न ही जान पर खेल कर कोई पृथ्वीराज आज संयोगिता को संगिनी बनाता है।
प्रेम के मायने मात्र एक लालच, एक तृष्णा बन चुके हैं,
सच्चाई सबसे दूर, कुछ ही के निकट है,
तो वो 'कुछ ही आँखों से आंसूं सुखा लेते हैंपर हे बादल, तुम क्यों नियति भुला शोखी भुला आते हो ?तुम तो जन्मे ही हो सुख देने के लिए
तुम पर संभवत: अब तक नव काल कि छाया नहीं नहीं, क्योंकि,
विचलन- तड़पन संसार से उठ गयी है,
कोई भी दुसरे के लिए तड़पना नहीं जानता,
कोई रात भर सिसकियों से झुझना नहीं जानता,
शमा-परवाने कि दास्ताँ बहुत पुरानी हो चुकी है,
हीर-रांझा को कोई नहीं पहचानता!!!
तो, हे बादल, तुम क्यों पुरानी बेड़ियाँ नहीं तोड़ डालते???
तुम्हारा काम है बरसना, न कि , किसी तरसती आँखों को देख विचलना है,
तुम जाओ, बरसो अपना कर्म संपन्न करो,
दूसरों के लिए तड़पना, अपने कर्म कि परवाह न करना ठीक नहीं,
तुम्हे भी तो बरखा को मुक्त करके, सागर कि लहरों में मिलाना है,
एक अदना बिरहन के लिए, उन दो सच्चे प्रेमियों को मिलने से क्यों रोकते हो?
कहती है आज करिश्मा, सच्चा प्रेम आज प्रकृति में ही विद्यमान है,
सांसारिक लोभ-माया से क्यों अपना सर फोड़ते हो?
तुम आओ… मचलो… झूमो… नाचो….
पर, बिरहन को दृष्टि से ओझल कर
रिमझिम पानी बरसाओ,
हे बादल आओ, आज झूम- झूम के बरस जाओ।
-करिश्मा
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