Wednesday, August 23, 2017

तीन तलाक और नवीन दृष्टिकोण

भारतीय सामाजिक सुधार आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में 1400 वर्षों से चली रही तीन तलाक नामक कुप्रथा को असंवैधानिक किये जाने की घोषणा के साथ 22 अगस्त 2017 का दिन स्वर्णाक्षरों में अंकित हो गया जब मानवाधिकारों, नैतिक मूल्यों, आदर्शों, नारी की गरिमा, आत्म- सम्मान एवं गौरव को एक नयी ऊंचाई पर लाने के लिए माननीय सर्वोच्च न्यायलय के द्वारा कठमुल्ला पंथी विचारों पर अंतिम प्रहार करके देश की सरकार को तीन तलाक नामक कबायली प्रथा को समाप्त करने के लिए छह मास के भीतर विधयेक लाने का आदेश दिया. आर्थिक रूप से अमेरिका, चीन, ब्रिटैन, रूस एवं जापान के समकक्ष प्रतियोगी के रूप में उभरता भारत इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक की ओर अग्रसर होते हुए भी सामाजिक एवं धार्मिक क्षेत्र में कहीं कहीं आज भी पुरातन व्यवस्था की ज़ंजीरों में जकड़ा हुआ है. जहाँ विश्व के कई इस्लामिक देश तीन तलाक जैसी कुप्रथा को वर्षों पहले त्याग चुके हैं वहां भारत लम्बे समय तक संशय की स्थिति में रहा, आखिर कार 22 अगस्त 2017 को दो के मुकाबले तीन मतों के बल पर माननीय सर्वोच्च न्यायलय की खंडपीठ के द्वारा 395 पृष्ठों के निर्णय में मुस्लिम समाज की आधी जनसंख्या (जिसका प्रतिनिधित्व महिलाएं करती हैं) को सम्मान के साथ जीने के लिए सुरक्षा कवच प्रदान कर दिया. इस निर्णय से उन महिलाओं के अधिकारों की जीत हुई जो कि जन्म के साथ ही इस डर के साथ जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर होती हैं कि निकाह के उपरान्त पति की संपत्ति हो जाती हैं जिसको पति किसी भी पल किसी भी स्थिति में तीन  क्रूर शब्द बोलकर त्याग सकता है.
मुस्लिम सामाजिक व्यवस्था की नींव प्राचीन अरबी समाज से जुडी हुई हैं, जिसमे समय के साथ साथ महिलाओं को पुरुष प्रधान समाज में किसी संपत्ति की भांति समझा जाने लगा जिसका सम्पूर्ण जीवन पुरुष की दया पर निर्भर होने लगा, उसको उपभोग की वस्तु समझा जाने लगा. मुस्लिम विधि में विवाह जैसी पवित्र संस्था को संस्कार मान कर एक समझौता माना गया जिसमे जन्म जन्मांतर तक साथ रहने जैसी परिकल्पना के लिए कोई स्थान नहीं था जिस कारण वैवाहिक सम्बन्ध को अपनी सहूलियत के अनुसार बनाया जाने लगा. यही कारण कि मुस्लिम विधान में विवाह विच्छेद की प्रक्रिया को अति सरल बना दिया गया. मुस्लिम विधान के अंतर्गत कुरान का स्थान सर्वोपरि रहा जिसके पश्चात् सुन्नत, अहदीस, इजमा कयास को प्रधान स्रोत के रूप में महत्त्व दिया गया जबकि उर्फ़( रिवाज़), न्यायिक विनिश्चय, विधायन, न्याय, साम्य को गौण स्थान दिया जाता रहा. कुरान में भी तीन तलाक के बजाय "तलाक केवल दो बार" कह कर तीन तलाक की क्रूर प्रवृत्ति पर पूर्ण विराम लगाया गया(कुरान: 2.229). कुरान में स्पष्ट उल्लेख के बावजूद मुस्लिम समाज ने इस विषय पर अलग अलग व्याख्याएं दीं जिसके अंतर्गत पैगम्बर मोहम्मद साहब के पश्चात् आये खलीफाओं के आदेशों को तोड़ मरोड़ कर पौरुष प्रवृत्ति की लिप्सा को संतुष्ट करने के लिए महिलाओं के शोषण को हर हद तक बढ़ावा दिया. मौलाना वहीदुद्दीन खान भी स्वीकार करते हैं कि कुरान एवं हदीस एक साथ तीन तलाक की इजाज़त नहीं देता. इस विषय में पहले खलीफा ने भी स्पष्ट किया था कि यदि कोई व्यक्ति तीन बार तलाक कहता है तो उसको एक ही माना जाये. तीन बार तलाक तीन महीनो के अंतराल पर एक एक बार बोला जाये. दूसरे खलीफा उमर फारुख के समय भी यही स्थिति विद्यमानरही किन्तु कालांतर में तलाकों की संख्या में वृद्धि होने की स्थिति में एक साथ तीन तलाक को मान्यता प्रदान की गयी किन्तु इस के साथ ही ये आदेश भी पारित किया गया कि ऐसा करने वाले की पीठ पर कोड़े बरसाए जाएँ ताकि वह समाज के लिए नज़ीर बन जाए ओर लोग तीन तलाक कहने से भयभीत रहें. इस के बाद तेहरवीं शताब्दी में इब्न तैमिया ने भी एक साथ तीन तलाक को अनुचित माना. सम्प्रति, उलेमा वर्ग ने सहूलियत के अनुसार तीन तलाक के विषय में समाज को अवगत करवाया किन्तु पूरे आदेश से परिचित नहीं करवाया जिसमे कोड़े बरसाने की बात कही गयी थी. तीन तलाक की पृष्ठ भूमि में मुस्लिम विधान में प्रचलित तलाकों के तरीकों के विषय में विचार किया जाना उचित रहेगा. मुस्लिम समाज में स्थापित तलाक के तरीके इस प्रकार हैं:
1.       तलाक प्रत्यायोजित तलाकखुला
2.       इला मुबारत
3.       जिहार
जबकि न्यायिक विवाह विच्छेद(मुस्लिम विवाह विच्छेद अधिनियम 1939) के अंतर्गत हैं:
1.       लियन
2.       फ़स्ख़
पुन: तलाक को वर्गीकृत किया गया है:
1.   तलाक़-- सुन्नत
1)      तलाक़-- अहसान
2)      तलाक़--हसन
2.   तलाक़-उल - बिद्दत
तलाक- ए - अहसान को उत्तम कोटि का तलाक माना गया है जबकि इसके ठीक विपरीत तलाक-उल-बिद्दत को निन्दित अथवा पापमय तलाक माना गया जिसमे एक साथ तीन तलाक कहकर विवाह विच्छेद किया जाता रहा. तीन तलाक मामले में कुरान एवं हदीस ने महिलाओं को भी व्यापक अधिकार दिए. मौलाना वहीदुद्दीन खान के अनुसार महिलाओं के लिए खुला के तहत तलाक हासिल करने के दो तरीके होते हैं:
1.   अदालत के माध्यम से
2.   महिला यदि चाहे तो अपने निकाह नाम में लिखवाये की उसका निकाह निकाह-ए-तफ़वीज़ है.
किन्तु विडंबना है की उलमा इस आशय की जानकारी जनसाधारण को नहीं देते.
सर्व विदित तथ्य है कि भारतीय सिने तारिका मीना कुमारी उर्फ़ महाज़बीं बानो भी तीन तलाक का शिकार हुई जब आवेश में आकर उनके शौहर कमाल अमरोही ने उन्हें तीन बार तलाक बोल कर निकाह विच्छेद कर दिया. आवेश शांत होने के बाद पुनः गृहस्थी बसाने के लिए इस्लामिक विधि का पालन  करते हुए इद्दत के बाद हलाला, हलाला के बाद पुनः इद्दत की अवधि का अनुसरण करना पड़ा. यहाँ हलाला का ज़िक्र करना आवश्यक है. हलाला एक ऐसी प्रथा है जिसमे अपने पूर्व शौहर से पुन: निकाह पढ़वाने के उद्देश्य से महिला को किसी पराये व्यक्ति से निकाह करके  वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित करने पड़ते हैं, जिसके बाद दूसरा शौहर महिला को तलाक देता है एवं एक बार फिर इद्दत की अवधि गुजरने के पश्चात् ही पूर्व शौहर से पुन: निकाह हो पाता है. इसी क्रम में मीना कुमारी को अमानुल्लाह खान( अभिनेत्री ज़ीनत अमान के पिता) के साथ विवाह करके हलाला की अपमानजनक अमानवीय प्रथा को अपना कर पुनः तलाक के बाद इद्दत की अवधि बिताने के बाद कमालअमरोही से पुनः निकाह पढ़वाना पड़ा. इस सब घटना क्रम में सुपर स्टार मीना कुमारी मानसिक रूप से इतनी त्रस्त हुई कि महज़ 39 वर्ष की अल्पायु में मृत्यु को प्राप्त हो गयी. मीना कुमारी जैसी कितनी ही महिलाएं सदियों से इस अवसाद की शिकार हुई होंगी, इसका अनुमान स्वत: ही लगाया जा सकता है.
यहाँ तीन तलाक के प्रति विश्व के अन्य देशों के रुख का उल्लेख किया जाना भी समीचीन प्रतीत होता है. जहाँ भारत में मुस्लिम पर्सनल बोर्ड तीन तलाक को खुदा का कानून बता कर संशोधन किये जाने का विरोध करता रहा है वहीँ विश्व के  कई प्रमुख इस्लामिक देशों ने इस प्रथा को मानव अधिकारों के विरुद्ध मानकर इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया है जिसमे उल्लेखनीय हैं:पाकिस्तान( वर्ष 1961), बांग्ला देश, श्री लंका, इंडोनेशिया, अल्जीरिया, ट्यूनीशिया( वर्ष1956), साइप्रस ( वर्ष 1980), सीरिया( वर्ष 1953), इराक ( वर्ष1959), ईरान, सूडान ( वर्ष 1935) एवं तुर्की ( वर्ष 1926).
भारतीय मुस्लिम समाज की इसी नकारात्मकता का परिणाम हुआ कि समाज में अपने वैवाहिक हितों को सुरक्षित करने एवं नारी की गरिमा आत्मसम्मान की रक्षा के लिए स्वयं महिलाओं ने स्वर प्रखर किया. काशीपुर की सायरा बानो, जयपुर की आफरीन रहमान, हावड़ा की इशरत जहाँ, हरिद्वार की आतिया साबरी तथा रामपुर की गुलशन परवीन ने समाज के साथ लोहा लेकर तीन तलाक की संवैधानिकता को चुनौती देते हुए माननीय सर्वोच्च न्यायलय में याचिका दायर की. सौभाग्य वश दिनांक 16.10.2015 कर्नाटक की हिन्दू महिला फूलवती के हिन्दू उत्तराधिकार कानून को चुनौती वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान माननीय सर्वोच्च न्यायलय ने मुस्लिम महिलाओं के साथ भेदभाव के मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लेकर जनहित याचिका दायर करने का आदेश दिया था. केंद्र सरकार भी इस विषय पर सकारात्मक विचार रखती रही है. जहाँ तक मुस्लिम पर्सनल बोर्ड का प्रश्न है तो प्रारम्भिक नकारात्मक व्यवहार व विचारों में समय के साथ परिवर्तन देखने को मिला जिसके क्रम में बोर्ड ने आदर्श निकाहनामा जारी कर के तीन तलाक कहने वालों के बहिष्कार करने की बात कही.
 इस प्रकार हिन्दू कोड बिल व सती प्रथा उन्मूलन के समय जिस प्रकार वातावरण बन रहा था, ठीक उसी प्रकार मुस्लिम समाज में चली आ रही 1400 वर्ष पुरानी तीन तलाक प्रथा के विरुद्ध चिंगारी सुलग रही थी बस हवा देने की आवश्यकता थी. मामले की नज़ाकत को ध्यान में रखते हुए धर्म निरपेक्षता के अनुपालन में सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा  तीन तलाक प्रथा पर निर्णय देने के लिए खंडपीठ का निर्माण किया जिसमे स्वयं मुख्य न्यायधीश जस्टिस जे० एस० खेहर के अतिरिक्त चार और न्यायधीश नियुक्त किये गए जो कि भिन्न भिन्न धर्मों से सम्बंधित हैं. जस्टिस जे० एस० खेहर( सिक्ख), जस्टिस एस० अब्दुल नज़ीर( मुस्लिम), जस्टिस कुरियन जोसेफ( ईसाई), जस्टिस जे० आर० एफ0 नरीमन( पारसी), तथा जस्टिस यू० यू० ललित (हिन्दू).
 इस्लामिक पुरातन व्यवस्था एवं आधुनिक भारतीय संवैधानिक स्थिति का विश्लेषण करते हुए खंडपीठ ने अपने विचार प्रस्तुत किये. जस्टिस जे० एस० खेहर ने अपने विचार में तीन तलाक प्रथा को मुस्लिम पर्सनल बोर्ड से सम्बंधित होने के कारण इसको संविधान के अनुच्छेद 25 के अंतर्गत संरक्षित बताया जिसके ऊपर सरकार को विधि निर्माण करना चाहिए. जस्टिस एस० अब्दुल नज़ीर ने माना कि तीन तलाक प्रथा से अनुच्छेद 14,15,21,25 का कोई उल्लंघन नहीं हो रहा है अत: न्यायिक हस्तक्षेप अपेक्षित नहीं है. इन दोनों मतों के विपरीत जस्टिस कुरियन जोसेफ ने इस प्रथा को कुरान के सिद्धांतों के खिलाफ होने के कारण शरीयत का उल्लंघन माना. जस्टिस जे० आर० एफ0 नरीमन ने इसको हनीफी कानून में पाप होने के कारण अनुच्छेद 25 से संरक्षित नहीं माना. इसके साथ ही जस्टिस यू० यू० ललित ने इसको संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन माना क्योंकि तीन तलाक प्रथा वैवाहिक संबंधों को सुधारने का कोई अवसर दिए बिना एक झटके में विवाह विच्छेद कर देती  है. जो कि मुस्लिम महिलाओं के मानवाधिकारों, आत्मसम्मान एवं गौरव के विरुद्ध है. इस प्रकार गहन चर्चा के बाद माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने बहुमत से 1400 वर्षों से चली आ रही कुप्रथा पर अंतिम प्रहार करते हुए छह माह के भीतर इस प्रथा के विरुद्ध कानून बनाने का सरकार को आदेश निर्गत कर दिया.
उक्त निर्णय पर कट्टर पंथी अवश्य ही निराश हुए किन्तु महिलाओं को खुले आसमान में उड़ने का अवसर मिल गया. मौलाना डॉ० कल्बे सादिक ने न्यायालय के निर्णय पर टिपण्णी देते हुए माना कि तीन तलाक अल्लाह को पसंद नहीं है और न ही मुस्लिम विधि में इस व्यवस्था को कोई स्थान प्राप्त है. ये मुल्लाओं के द्वारा बनायीं गयी व्यवस्था है जिस पर लगाम लगाने के लिए कानून बनाना लाज़िमी है. अंतत: सदियों से चली आरही इस कुप्रथा पर महज 395 पृष्ठों में कैद निर्णय ने नि: संदेह कुठाराघात कर दिया और इस प्रथा से बुरी तरह प्रभावित मुस्लिम महिलाओं को सम्मान के साथ जीने के लिए एक आधार दिया है.

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