Saturday, April 9, 2011

"भ्रष्टाचार .....अन्ना का आह्वान....हमारा भविष्य" कलियुग के समय में उत्पन्न पृथ्वी पर पापों के ढेर में एक भ्रष्टाचार हुआ.मन में विचार किया कि इस भ्रष्टाचार की उत्पत्ति कहाँ से हुई? मन कुलबुलाया, सकुचाया, थोडा शरमाया..फिर बोला ;थोडा दिमाग को भी व्यायाम करने दो, सारे पाप मुझ से ही क्यों करवाते हो? दिमाग कि तरफ रुख किया, पर दिमाग तो बड़ा तेज निकला, अपनी तरफ रुख देख अपनी आँखें बंद करने का नाटक करने लगा। काफी मनाया तब जा कर एक हिंट दी जिसे समझने मैं बेवकूफ देर लगाती रही...झल्लाकर दिमाग चिल्लाया: सुबह बिजली का बिल भरने के लिए लाइन में लगी थी? मैंने शान से कहा: "लाइन में लगने कि बात करते हो, हम आज तक लाइन में नहीं लगे जनाब, और बिजली विभाग के तो सारे लोग अपनी पहचान के हैं, वहां तो सवाल ही नहीं उठता"। कहने के बाद मैं स्वयं चौंक पड़ी...दिमाग ने पलट के कहा ,"क्यों बत्ती जल गयी"...बड़ी बातें करती हो भ्रष्टाचार को समाप्त करने कीजब खुद पर आती है तो सुरमा बन जाती हो। दिमाग की बात सुन शरीर हिलने लगा, फिर दिमाग की तरफ हैरत से देखा और पूछा, भैया यह तो बताओ, यह लोकपाल बिल का क्या हल्ला है? दिमाग ने कहा," क्यों, क्या घास चरने की तय्यारी है,आज़ादी अंग्रेजों से पाकर अपने ही चुने लोगों की गुलाम बन गयी...खुद पावर्टी लाइन के निचे रह के चुने लोगों के स्विस खातों में करोड़ों भरवाती रही, चैन नहीं मिला क्या, जो अब अपने ही हाथों लोकतंत्र का गला घोंट कर तानाशाही की नींव रखने के लिए पागल हुई जा रही? सर खुजाते हुए पूछा," भैया, मैं कुछ समझ नहीं पाई", तब दिमाग ने बड़े एहसान दिखाकर समझाते हुए कहा," वैसे तो हम अपना ज्ञान अधिक बांटते नहीं, लेकिन तुम जोर दे रही हो तो बताये देते हैं, तो सुन, ..लोकपाल बिल बनाए जाने से एक ही व्यक्ति में विधायी , कार्यकारी, प्रशासनिक, न्यायिक ,सैनिक शक्तियों को प्रदान किया जायेगा, जिसके ऊपर किसी का अंकुश न होने की स्थिति में एक ऐसा पल आने का खतरा जब वेह शक्तिमान व्यक्ति सार्वभौमिक सत्ता प्राप्त करने के पश्चात निरंकुशता को प्रश्रय देने लगे "। मैंने दिमाग की और टकटकी लगा कर देखा और पूछा," अब क्या करना चाहिए?" दिमाग ने अति विद्वता से कहा," अन्नाजी की टीम में शामिल लोग उन सभी तबकों का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे हैंजिनके हितों की वेह बात करते हैं, अत: हमारा दायित्व बनता है की हम अपने दोस्तों को आगाह करें की अपने अधिकारों की जंग में यदि अब पिछड़े तो .......अँगरेज़ तो विदेशी थे चले गए...अपने ही भाईओं को निरंकुशता के तख़्त से कैसे उतार पाओगे॥???" कहकर दिमाग ध्यान मग्न हो गया और मैं जैसे नींद से जाग गयी। (करिश्मा पाल)

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