आज यूँ ही जब ज़िन्दगी की बही को टटोला,एक एक पन्ना धुल में सना मिला,
जिंदगी की ऊँचाइयों और निचाईयों के चक्र में उलझ कर इसकी जांच ही नहीं की कभी,
एक पन्ने पर रिश्तों की गणना में एक एक कर सभी गलतियाँ ही मिली,
रह गयी एक अकेली मैं फिर उसी मुकाम पर
जहां से जनम लिया था ,एक छोटे से कमरे में..मैं॥
No comments:
Post a Comment