रस्ते से गुज़रते हुए
आधुनिक संभ्रांत महिलाओं के कुछ विचार विचारणीय लगे
जब उनसे सुना कि
दिन बदल चुके हैं, नारी की विवेचना भी बदलनी होगी,
हम समाज मे सम्मानित, प्रबुद्ध, शक्तिवान हैं
अब सबको सोच बदलनी होगी।
बरबस आँखों के समक्ष कुछ दिन पहले की घटनाओं ने चलचित्र जैसे छाप दिया, जब,
एक माँ अपनी 16 साल की बेटी को लेकर
सामुहिक विवाह योजना में बिटिया की शादी रचाने की चाहत लेकर आई थी।
वो 16 साल की मासूम बच्ची, यौवन की दहलीज पर कदम रखने के ख़्याल से भयभीत सहमी सी,
मानो कोई कबूतर आँखे मुंदी धूर्त सन्त बिल्ली की मंशा जानता हो,
मैडम, कुछ भी हो बिटिया की शादी करवानी है,
कब तक बचाऊंगी इस सौंदर्य को जो भगवान ने इसको दे दिया है अनजाने में।
मां की गुहार काफी थी बखान को, महिला कितनी सशक्त है
21वीं सदी में चांद पर पहुंची उसी दुनिया मे अपने चाँद की आबरू बचाने को।
उफ्फ्फ, हमने अंतरिक्ष चीर दिया, न जाने क्या क्या कीर्तिमान बना डाले,
पर उनका क्या करें जो समाज का 90 प्रतिशत हिस्सा है
जिनकी समस्या रोटी के अलावा बेटी की आबरू अभी भी है?
आधुनिकता के मेकअप में लिपा पुता 10% समाज उस माँ की व्यथा कैसे समझे,
समाज का स्तरीकरण चरम पर जो है।
बेटी का सौंदर्य गरीब का अभिशाप है तो वहीं बदसूरती तो पाप है,
दूसरी माँ की आवाज़ गूंज रही थी कमरे में
मैडम, अबकी बार दूल्हा मंडप से नहीं भागेगा,
गारंटी है,
हमने उसको लड़की की शक्ल पहले से दिखला दी है,
गरीबी में सामूहिक विवाह हो जाये बस इतनी कृपा कीजिये
पहले डर के लड़की को लड़के से नहीं मिलवाया था,
माफ कीजिये।
चलचित्र आँखों मे अनवरत रहेगा...ये अथाह है, विस्तृत श्रृंखला है,
हमको तो बस हर बरस,
महिला सशक्तिकरण पर तालियां बजाना है,
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ज़ोर शोर से मनाना है।
- करिश्मा पाल
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