समय के संग चेहरे बदले, इंसान बदल गया,
जो रहता था झोंपड़ी में, वो मकान बदल गया,
सराय की जगह ली पंचसितारा होटलों ने,
ढाबों जैसे भोजन का स्थान बदल गया ।
पूरी- कचोरी त्योहारों का आभास करवाते थे ,
आज पिज्जा-चाऊमिन से स्वाद बदल गया ।
स्त्री जो परदे के पीछे से बातें सुनती थी,
वकील-डोक्टर बन कर सारा हिसाब बदल गया।
संयुक्त परिवार की वंश परंपरा जो थी विद्यमान,
एकल परिवार अवधारणा से व्यवहार बदल गया।
सोचती हूँ 'करिश्मा,'
अगर नहीं बदला है तो वो है हमारा विधान,
मनुस्मृति,मिताक्षरा, कौटिल्य के अर्थशास्त्र ने समाज जकड रखा है ,
पुरातन व्यवस्था नहीं है किन्तु
कानून विवाह का है वैसा ही ।
आज जब परिवर्तन के दौर में जन की पहचान होनी चाहिए मन से,
पर रंग-जात -भाषा प्राथमिकता बनी की बनी हैं।
भौतिक रंगों से सामाजिक सियार रंगा हुआ है,
पंचतंत्र के सियार की याद दिलाता हुआ सिंह बनने की कोशिश में लगा हुआ है ।
आज, जब मकान बदल सकते हैं ,
जीवन के मापदंड बदल सकते हैं , तो ,
क्यों पुरातन व्यवस्था को बदला नहीं जा सका है?
आज की ज़रूरत है की
मनुस्मृति को बदलना होगा,
मिताक्षरा के विधान को फैंक नए विधान का सृजन करना होगा ,
ईसा पूर्व की कृति अर्थशास्त्र को केवल शोकेस में सजाना होगा ,
जो भूत है वो क्यूँ है आज पर हावी?
क्यों बलशाली हो पुरातन विधान,
क्यों अंग्रेजों का विधान हो बलवान?
जब समय परिवर्तन का परिचायक है, तो
क्यों उस विधि को नहीं बदल सकते जो समाज की ज़रूरतों के लिए बनती है?
विधि व्यक्ति का अधिकार है,उसके कर्तव्यों को बताता है
तो क्यों न हम सब मिलकर नए विधान की स्थापना करें ,
इक्कीसवीं शताब्दी के युग में एक नयी सोच, एक नयी मानसिकता का सृजन करें?
"इक्कीसवीं शताब्दी के युग में एक नयी सोच, एक नयी मानसिकता का सृजन करें?"
ReplyDeleteसार्थक और नितांत आवश्यक सोच - शुभकामनाएं
भावनात्मक, सार्थक एवं उन्नतिशील विचारों से परिपूर्ण कृति के सृजन हेतु बधाई की पात्र हैं आप. मेरी शुभकामनाएं आप के साथ हैं.
ReplyDeletegreat thoughts.
ReplyDeletedhanyvaad
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